Friday, 22 January 2016

"बाबरी और राजनीति"

भले माफ ना करें लेकिन भलाई नई शुरुआत करने में ही है.. वरना नफरत और बदले की राजनीति का तो कोई अंत मुझे नहीं दिखता.. अगर मुद्दे को बेजान करना है तो दोनों तबको को नई शुरुआत करनी होगी .. वर्णा बाबरी और दादरी का अंतहीन सिलसिला चलता रहेगा और राजनीति की रोटियां सेंकी जाती रहेगी.. फिर ओवैसी भी रहेगा, भागवत भी, और बाकी यह छोटे-छोटे तुच्चे भी उनके फेेके हुए टुक ड़ों पर अपना पेट चलाते रहेंगे.. और कटे मरेंगे आम लोग..

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