खून से सने धर्मों के खून के प्यासे अनुयाई पूरी दुनिया में तबाही मचाते चल रहे हैं. कभी दादरी तो कभी मालदा आम बात हो चली है. आप माने या न माने देश उस वक्त भी असहिष्णु था और आज भी असहिष्णु है. कारण एक ही है "धर्म". (मैं अभी 26/11, 9/11 तथा चार्ली हेब्दो की बात नहीं कर रहा, क्योंकि आज कल फैशन चला है ऐसे आतंकवादी गतिविधियों को धर्म से जोड़ कर नहीं देखा जाने का. खैर मैं आज एक नहीं बल्कि सभी धर्म के लोगों को चोट पहुंचाने की कोशिश करूंगा) खुद को शांतिपूर्ण बताने वाले ये सारे धर्म शांति का संदेश कभी दे ही नहीं सकते हैं.
आप एक बार इन धर्मों का साहित्य उठाकर देखें (जिन्हें आप धर्म ग्रंथ कहते हैं मैं उन्हें सिर्फ साहित्य कहता हूं) आपको सब रक्त रंजित दिखेगा. महाभारत, कुरान, बाइबल, रामायण, गुरु ग्रंथ सब में मारकाट, लड़ाई, युद्ध ज़रुर दिखाई देगा आपको. रक्तरंजित ये धर्म शांति का संदेश कबसे देने लगे? ये तो शुरु से ही हिंसक रहे हैं. ये धर्म नहीं अधर्म है. इन्होंने अपने अहिंसा तथा रक्त रंजित संदेशों को छुपाने के लिए शांति नाम के एक पर्दे का महज इस्तेमाल भर किया है. अगर यह धर्म ना होता तो विश्व में युद्धों की संख्या एक चौथाई होती.
( नोट: कृपया अपने अपने धर्मो का बचाव करते हुए मेरे इनबॉक्स तक ना आए)
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