कल रवीश कुमार जी का प्राइम टाइम देखे बिना मैं सो गया. सो गया क्योंकि बहुत थका हुआ था, थका हुआ था क्योंकि पिछले 3 दिन से ठीक से नहीं सोया था, नींद इसलिए नहीं आती थी क्योंकि मेरे अपने दोस्त, कुछ परिवार वाले, और देश भक्त भेड़ियों की भीड़ मुझे रोज देश द्रोही गद्दार और आतंकवादियों का समर्थक बोलती है. मेरी गलती महज़ इतनी है कि मैंने जेएनयू से पढ़ाई की है.
जेएनयू वाले क्यों लड़ रहे हैं किस चीज के लिए लड़ रहे हैं, किससे लड़ रहे हैं- भीड़ को अभी तक यह बात समझ में नहीं आई है. दुर्भाग्य इस बात का है कि अगर समझाओ तो भी ये समझने को तैयार नहीं होते. जिन्हें राष्ट्र का मतलब पता नहीं है वह हमें राष्ट्र विरोधी बताते हैं. इनमें ज्यादातर वह है जो हिंदू राष्ट्र के निर्माण की बात करते हैं और उनके हिसाब से राष्ट्र की परिभाषा वो और उनके "हिंदू-राष्ट्रवादी" प्रधानमंत्री ही तय करेंगे. जो इसे नहीं मानेगा वह राष्ट्रद्रोही है. चलिए ठीक है मैं राष्ट्रद्रोही हूं लेकिन देशद्रोही नहीं.
जिन 10 लोगों ने भारत की बर्बादी के नारे लगाएं मैं उन से बिल्कुल सहमत नहीं हूं, वह 10 लोग जिंहोने मुंह छुपा कर भारत की बर्बादी के नारे लगाए हैं वो जेएनयू नहीं है. जेएनयू के शिक्षक और सारे के सारे छात्र संगठन एक स्वर में इसका विरोध कर चुके हैं. लेकिन यह बात "देशभक्तों" के समझ नहीं आती. उनका दिमाग अब तक इस बात को समझ ही नहीं पाया है कि जेएनयू में विरोध किस चीज के लिए हो रहा है. मैं हैरान हूं ऐसे राष्ट्र से जो उन दस देश विरोधी नारों से हिल गया. मैं हैरान हूं ऐसे राजनेताओं से जिन्होंने हनुमंतप्पा के शहादत को भी अपने राजनैतिक स्वार्थों का शिकार बनाया. यह वही राजनेता है जिन्होंने One Rank One Pension के लिए संघर्ष कर रहे पूर्व सैनिकों की एक नहीं सुनी. उनके कपड़े फाड़ कर उनकी मांग को नंगा घोषित कर दिया. लेकिन भीड़ के पास इतना दिमाग कहा कि वह ऐसी चीजों पर चिंतन कर सके.
मैं ऊब चुका हूं खुद को साबित करते-करते. अर्णब गोस्वामी, सुधीर चौधरी, दीपक चौरसिया जैसे पीत पत्रकारिता के दलालों ने इस भीड़ को यह बताया कि कंहैया नारे लगा रहा था, उन्होंने भीड़ को यह जताया कि उमर खालिद ( जो नाम से मुसलमान प्रतीत होता है) एक आतंकवादी है. उन्होंने यह नहीं बताया कि वह एक नास्तिक है, उन्होंने मनगढ़ंत IB की रिपोर्ट बनाई और कहा कि इसके संबंध "जैश-ए-मोहम्मद" नामक आतंकवादी संगठन से है और भीड़ बौखला गई. कुछ लोगों ने तो इसे सरगना वरगना जैसे अंट-शंट शब्दों से कलंकित किया और मुझे पता है की वे शर्मिंदा नहीं है. अब जब यह सारी बातें और वीडियो झूठ साबित हो चुकी हैं तो भी इनकी इनकी फैलाई हुई गंध हवा में अभी मिलि हुई है. जिन लोगों ने भारत विरोधी नारे लगाए उन्हें पकड़ने में पुलिस की असमर्थता इस बात का सबूत है कि सरकार उंहें पकड़ना नहीं चाहती बल्कि कुछ और करना चाहती है. और मैं अभी इस मूड में नहीं हूं कि आप को समझाऊँ सरकार क्या करना चाहती है. आप बस इतना समझ लीजिए की सरकार जो करना चाहती है उसी के खिलाफ मेरा जेएनयू आज खड़ा है.
जिन राष्ट्र प्रेमियों के मन को दुख पहुंचा है उन से अनुरोध है कि व्यर्थ मुझे गालियां ना दें. थोड़ी पढ़ाई लिखाई करें, चिंतन मनन करें, फिर हम से बात करें.
जेएनयू वाले क्यों लड़ रहे हैं किस चीज के लिए लड़ रहे हैं, किससे लड़ रहे हैं- भीड़ को अभी तक यह बात समझ में नहीं आई है. दुर्भाग्य इस बात का है कि अगर समझाओ तो भी ये समझने को तैयार नहीं होते. जिन्हें राष्ट्र का मतलब पता नहीं है वह हमें राष्ट्र विरोधी बताते हैं. इनमें ज्यादातर वह है जो हिंदू राष्ट्र के निर्माण की बात करते हैं और उनके हिसाब से राष्ट्र की परिभाषा वो और उनके "हिंदू-राष्ट्रवादी" प्रधानमंत्री ही तय करेंगे. जो इसे नहीं मानेगा वह राष्ट्रद्रोही है. चलिए ठीक है मैं राष्ट्रद्रोही हूं लेकिन देशद्रोही नहीं.
जिन 10 लोगों ने भारत की बर्बादी के नारे लगाएं मैं उन से बिल्कुल सहमत नहीं हूं, वह 10 लोग जिंहोने मुंह छुपा कर भारत की बर्बादी के नारे लगाए हैं वो जेएनयू नहीं है. जेएनयू के शिक्षक और सारे के सारे छात्र संगठन एक स्वर में इसका विरोध कर चुके हैं. लेकिन यह बात "देशभक्तों" के समझ नहीं आती. उनका दिमाग अब तक इस बात को समझ ही नहीं पाया है कि जेएनयू में विरोध किस चीज के लिए हो रहा है. मैं हैरान हूं ऐसे राष्ट्र से जो उन दस देश विरोधी नारों से हिल गया. मैं हैरान हूं ऐसे राजनेताओं से जिन्होंने हनुमंतप्पा के शहादत को भी अपने राजनैतिक स्वार्थों का शिकार बनाया. यह वही राजनेता है जिन्होंने One Rank One Pension के लिए संघर्ष कर रहे पूर्व सैनिकों की एक नहीं सुनी. उनके कपड़े फाड़ कर उनकी मांग को नंगा घोषित कर दिया. लेकिन भीड़ के पास इतना दिमाग कहा कि वह ऐसी चीजों पर चिंतन कर सके.
मैं ऊब चुका हूं खुद को साबित करते-करते. अर्णब गोस्वामी, सुधीर चौधरी, दीपक चौरसिया जैसे पीत पत्रकारिता के दलालों ने इस भीड़ को यह बताया कि कंहैया नारे लगा रहा था, उन्होंने भीड़ को यह जताया कि उमर खालिद ( जो नाम से मुसलमान प्रतीत होता है) एक आतंकवादी है. उन्होंने यह नहीं बताया कि वह एक नास्तिक है, उन्होंने मनगढ़ंत IB की रिपोर्ट बनाई और कहा कि इसके संबंध "जैश-ए-मोहम्मद" नामक आतंकवादी संगठन से है और भीड़ बौखला गई. कुछ लोगों ने तो इसे सरगना वरगना जैसे अंट-शंट शब्दों से कलंकित किया और मुझे पता है की वे शर्मिंदा नहीं है. अब जब यह सारी बातें और वीडियो झूठ साबित हो चुकी हैं तो भी इनकी इनकी फैलाई हुई गंध हवा में अभी मिलि हुई है. जिन लोगों ने भारत विरोधी नारे लगाए उन्हें पकड़ने में पुलिस की असमर्थता इस बात का सबूत है कि सरकार उंहें पकड़ना नहीं चाहती बल्कि कुछ और करना चाहती है. और मैं अभी इस मूड में नहीं हूं कि आप को समझाऊँ सरकार क्या करना चाहती है. आप बस इतना समझ लीजिए की सरकार जो करना चाहती है उसी के खिलाफ मेरा जेएनयू आज खड़ा है.
जिन राष्ट्र प्रेमियों के मन को दुख पहुंचा है उन से अनुरोध है कि व्यर्थ मुझे गालियां ना दें. थोड़ी पढ़ाई लिखाई करें, चिंतन मनन करें, फिर हम से बात करें.
हां मैं यह कहना चाह रहा था कि आज जब रवीश कुमार के प्राइम टाइम का एपिसोड देखा जिसमें वह मुझे अंधेरे में ले गए, तो उस अंधेरे में दो चीजें बहुत साफ नजर आई. कुछ अज्ञानी देशभक्त, और देशभक्ति की आड़ में चलता एक बहुत बड़ा और गंदा फायदे-खोरी का धंधा. लगा जैसे अब देश बिक चुका है. दिल को बहुत दुख पहुंचा, इसी बीच जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष अकबर चौधरी जी का whatsapp मैसेज मेरे पास आया जिसमें उन्होंने जेएनयू में हो रहे आज के संघर्षों की जानकारी दी. और मैं अपनी आंखों को रोक न सका. लगा जैसे जिस जेएनयू ने मुझे सोचने समझने की शक्ति और चेतना दी है उस के दमन के खिलाफ कुछ करने में मैं असमर्थ हूं. रविश जी की आवाज़, अकबर चौधरी जी का मैसेज, और मेरे बहते हुए आंसू इस देश के बहुत सारे लोगों को अभी समझ में नहीं आए लेकिन आने वाले कुछ दिनों में शायद समझ में आ जाएंगे. मैं आशा करता हूं कि मोदी का हिंदुस्तान हिटलर का जर्मनी नहीं बनेगा.