पार्टी कोई भी जीते हारना तो बिहार को ही था.. जंगलराज बनाम दंगा राज की लड़ाई में बिहार की जनता ने जंगलराज को चुना. क्योंकि दंगे से बिहार को ज्यादा डर लगता है. बात भी सही है जातिवाद से ज्यादा खतरनाक है धर्म की लड़ाई. "बथानी टोला" से ज्यादा भयंकर था "गुजरात दंगा". लेकिन बुरे तो दोनो ही थे. खैर जिन लोगों को यह लगता है कि लालू नितिश महा गठबंधन के आने के बाद बिहार में जंगलराज जैसी कोई चीज नहीं आएगी वो लोग फिर गलती कर रहे हैं. उसी तरह जैसे कुछ लोग यह सोचते है कि अभी भी अच्छे दिन आएंगे. यह हम भारत के लोग के सोचने के तरीके का सबसे बड़ा खोट है. हम बड़े आशावादी लोग है. हमे जो नज़र आता है उससे ज्यादा विश्वास हम उस पर करते हैं जो हमे नजर नहीं आता. खैर वह तो अलग बात है. यहां बिहार में लोग कई प्रकार से खुश है. कुछ केवल इसलिए खुश है कि BJP हार गई, कुछ खुश है कि नितीश बाबू फिर से आ गए, कुछ आपने प्रिय लालू की वापसी पर खुश हैं. कुछ दंगो की टलने की खुशी में खुश है, कुछ यूं ही खुश हैं अलग-अलग कारणों से, लेकिन मैं खुश नहीं हूं क्योंकि मुझे पता है कि बिहार फिर से हारा है. क्योंकि मुझे पता है की बिहार की हार पहले से तय थी. चुनाव हारी हुई पार्टी पर मैं ज्यादातर टिप्पणी नहीं करता हूं. परंतु यहाँ टिप्पणी करना आवश्यक है. पिछले डेढ़ साल में जो गंदगी BJP ने फैलाई है उसका परिणाम BJP को भुगतना पङा है. चुनावी वादे जुमले करार दिये गए. शिक्षा और स्वास्थ्य बजट पे कैंची चलाई गई. RTI को कमजोर करने के पूरे प्रयास किए गए, भूमि अधिग्रहण कानून लाने के पूरे प्रयास किए गए, किसानों के उत्थान के लिए कुछ नहीं किया गया, बाल श्रम कानून को तोड़-मरोड़ा गया, स्वच्छता अभियान, जनधन और 12 रुपए में (कफ़न तथा) जीवन बीमा जैसे फ्लॉप प्रोग्राम चलाए गए. आधी से ज्यादा आबादी तक इन स्किमों को पहुंचाने में नाकाम रही सबसे बड़े प्रचारक पार्टी BJP. यह तो हुई BJP के विकास की बात. अब आते हैं सामाजिक पहलुओं पर. BJP का हिंदू राष्ट्रवाद का मंत्र स्वयं उसके लिए एक श्राप सिद्ध होता दिखाई दिया. BJP शायद यह भूल चुकी है कि ये 2015 का भारत है. यहां हिंदू मुस्लिम की राजनीति शायद अब नहीं चलेगी. देश को को रोटी चाहिए और नौजवानों को नौकरी. राजनीतिक पार्टियों ने शायद ध्यान नहीं दिया होगा कि 30 सितंबर 2010 को जब राम जन्म भूमि विवाद पर अलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला आया था सब सतर्कता बरतते हुए देश के आधे से ज़्यादा क्षेत्रो में CRPF तथा अन्य पुलिस बल की जबरदस्त तैनाती की गई थी. लेकिन सौभाग्य की बात यह थी कि युवाओं को इस फैसले से कोई मतलब नहीं था. इस फालतू के झगड़े से कोई लेना-देना नहीं था. यह अपने आप में एक बहुत बड़ी बात थी. यह संकेत था कि भारत 21वीं सदी में पहुंच चुका है. लेकिन नफरत फैलाने वाली पार्टियों को यह सारी चीजें कहां से नजर आने वाली है. लोकसभा चुनाव में यह ध्रुवीकरण काम कर गया. परंतु बिहार में उनकी दाल न गली. प्रधानमंत्री पद की गरिमा भूल कर ओछी राजनीति करने वाले मोदी ने अपनी आदत के अनुसार खूब अनर्गल बातें बोली. (जैसे आप के आरक्षण को काटकर दूसरे धर्म को आरक्षण दे दिया जाएगा). सवा लाख करोड़ के पैकेज का लालच भी दिया गया. अमित शाह के पाकिस्तान में पटाखें फूटने वाली बात कही तो दूसरी तरफ प्राची, आदित्यनाथ, साक्षी महाराज ने तो जैसे हिंदू धर्म का ठेका अपने सर पे उठा लिया था. "रामजादो-हरामजादों" से लेकर "दादरी" तथा देश भक्ति का सर्टिफिकेट बांटने मे पीछे नहीं हटे. अपने देश में गौ हत्या बंद करके बीफ बाहर के देशों में भेजा जा रहा है. मोदी के आने के बाद भारत विश्व में बीफ का सबसे बड़ा निर्यातक देश बन गया है. (घिना दिए थे महाराज) खैर नतीजा सबके सामने है.
हाहाहाहा अब आइए जंगल राज की बात करते है.. "आसमान से गिरे खजूर पे अटके"
लालू प्रसाद "यादव" के "बहुमत" में आने के बाद बिहार में जातिवाद पूरे रंग में दिखेगा.. जी हां "जब सैइयाँ भए कोतवाल फिर डर काहे का".. पटना की गलियों में अक्सर आपको सुनने में मिल जाएगा "हमर चच्चा उँहां हाथिन, हमर फुप्फा उँहां हाथिन एक बार कॉल करबइ त दरोगवा अपना जिपसि से खुद घरे तक छोड़तइ".. अगर आप लालू को इतना बेवकूफ समझते है कि "बहुमत" में रहने के बावजूद वह नितीश को उनकी मर्जी से शासन चलाने देंगे तो आप बेवकूफ है. लालू का ट्रैक रिकार्ड शायद अब भूल चुके हैं. कब से जेल में पङे सारे दबंग अब बाहर निकलेंगे. मुझे डर है कि चोरी डकैती, लूटपाट, अपहरण, बलात्कार, रंगदारी जैसी घटनाएँ कहीं आम न हो जाए.
वैसे कौन सा बहुत बड़ा तीर नितीश कुमार ने भी मार लिया एक दशक में. हमने उन्हें कोई एक दो दिन नहीं पूरा एक दशक दिया था. शिक्षकों की बहाली में धांधली से लेकर उनके वेतन तक कुछ भी तो नहीं सुधरा. शिक्षा तथा स्वास्थ्य की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं है. जो सुधरा वह 10 साल के समय के लिए काफी कम था. बिहार को काफी कुछ चाहिए था. सरकारी दफ्तरों की स्थिति वही है, घूसखोरी और लाल फीता शाही घटने का नाम नहीं लेती, जातिवाद अपनी चरमसीमा पर है, बिहार में अगङे पिछङे की राजनीति खूब हो रही है. और धर्मनिरपेक्षता तो भूल जाइए अगर BJP कॉमुनल है तो लालू नितिश कौन सा बड़ा सेक्युलर है? MY का समीकरण तो लगता है मैने बिठाया था.. किसने नहीं बाटा है धर्म के आधार पर लोग को? तो जो लोग इसे सोशल जस्टिस की जीत मान रहें हैं वो या तो गलतफहमी के शिकार हैं या सिर्फ मोदी की हार का मज़ा ले रहें हैं और सच्चाई को नज़रअंदाज करने का प्रयास कर रहें हैं.
और हां वामपंथीयों को तीन सीट जो मिली है उसके लिए उन्हें बधाई. लेकिन यह कैसा व्यवहार है JNU के प्यारे "चंदू" के हत्यारे पार्टी की जीत की खुशी में और BJP की हार की खुशी में आप इतने मशगूल हो गए की चंदू की शहादत को भूल चुके है. शायद यही आपकी राजनीति है शायद इसीलिए तीन सीट आपके पास है. आपने कभी जनता को एक अच्छा विकल्प नहीं दिया. आप कभी जनता में विश्वास नहीं जगा पाए. शायद आपको ऐसी राजनीति से ऊपर उठने की जरुरत है. कलाम की मौत पे उनकी गलतियाँ गिनाने से जो लोग नहीं चूके थे वो यहाँ भी अपने बुद्धिजीवी होने का संकेत दे तो मानू की राजनीति मे वो स्टैंड लेते हैं.
बिहार और इस देश को तीसरे विकल्प की जरुरत है. युवाओं को अपने सोचने का तरीका बदलना होगा. भाई-भतीजावाद, जातिवाद तथा संप्रदाय की राजनीति से ऊपर उठकर "अपनी सोच" विकसित करनी होगी. शायद इन राजनीतिक पार्टियों से अपने पुराने रिश्ते और बाकी बहुत से सामाजिक आवरणों तथा रीति रिवाज़ो को तोड़ना भी पड़ेगा. सृजन धीरे धीरे ही होता है. राजनीति में कदम रखना होगा तथा एक नई शुरुआत का बिगुल बजाना पड़ेगा.
हाहाहाहा अब आइए जंगल राज की बात करते है.. "आसमान से गिरे खजूर पे अटके"
लालू प्रसाद "यादव" के "बहुमत" में आने के बाद बिहार में जातिवाद पूरे रंग में दिखेगा.. जी हां "जब सैइयाँ भए कोतवाल फिर डर काहे का".. पटना की गलियों में अक्सर आपको सुनने में मिल जाएगा "हमर चच्चा उँहां हाथिन, हमर फुप्फा उँहां हाथिन एक बार कॉल करबइ त दरोगवा अपना जिपसि से खुद घरे तक छोड़तइ".. अगर आप लालू को इतना बेवकूफ समझते है कि "बहुमत" में रहने के बावजूद वह नितीश को उनकी मर्जी से शासन चलाने देंगे तो आप बेवकूफ है. लालू का ट्रैक रिकार्ड शायद अब भूल चुके हैं. कब से जेल में पङे सारे दबंग अब बाहर निकलेंगे. मुझे डर है कि चोरी डकैती, लूटपाट, अपहरण, बलात्कार, रंगदारी जैसी घटनाएँ कहीं आम न हो जाए.
वैसे कौन सा बहुत बड़ा तीर नितीश कुमार ने भी मार लिया एक दशक में. हमने उन्हें कोई एक दो दिन नहीं पूरा एक दशक दिया था. शिक्षकों की बहाली में धांधली से लेकर उनके वेतन तक कुछ भी तो नहीं सुधरा. शिक्षा तथा स्वास्थ्य की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं है. जो सुधरा वह 10 साल के समय के लिए काफी कम था. बिहार को काफी कुछ चाहिए था. सरकारी दफ्तरों की स्थिति वही है, घूसखोरी और लाल फीता शाही घटने का नाम नहीं लेती, जातिवाद अपनी चरमसीमा पर है, बिहार में अगङे पिछङे की राजनीति खूब हो रही है. और धर्मनिरपेक्षता तो भूल जाइए अगर BJP कॉमुनल है तो लालू नितिश कौन सा बड़ा सेक्युलर है? MY का समीकरण तो लगता है मैने बिठाया था.. किसने नहीं बाटा है धर्म के आधार पर लोग को? तो जो लोग इसे सोशल जस्टिस की जीत मान रहें हैं वो या तो गलतफहमी के शिकार हैं या सिर्फ मोदी की हार का मज़ा ले रहें हैं और सच्चाई को नज़रअंदाज करने का प्रयास कर रहें हैं.
और हां वामपंथीयों को तीन सीट जो मिली है उसके लिए उन्हें बधाई. लेकिन यह कैसा व्यवहार है JNU के प्यारे "चंदू" के हत्यारे पार्टी की जीत की खुशी में और BJP की हार की खुशी में आप इतने मशगूल हो गए की चंदू की शहादत को भूल चुके है. शायद यही आपकी राजनीति है शायद इसीलिए तीन सीट आपके पास है. आपने कभी जनता को एक अच्छा विकल्प नहीं दिया. आप कभी जनता में विश्वास नहीं जगा पाए. शायद आपको ऐसी राजनीति से ऊपर उठने की जरुरत है. कलाम की मौत पे उनकी गलतियाँ गिनाने से जो लोग नहीं चूके थे वो यहाँ भी अपने बुद्धिजीवी होने का संकेत दे तो मानू की राजनीति मे वो स्टैंड लेते हैं.
बिहार और इस देश को तीसरे विकल्प की जरुरत है. युवाओं को अपने सोचने का तरीका बदलना होगा. भाई-भतीजावाद, जातिवाद तथा संप्रदाय की राजनीति से ऊपर उठकर "अपनी सोच" विकसित करनी होगी. शायद इन राजनीतिक पार्टियों से अपने पुराने रिश्ते और बाकी बहुत से सामाजिक आवरणों तथा रीति रिवाज़ो को तोड़ना भी पड़ेगा. सृजन धीरे धीरे ही होता है. राजनीति में कदम रखना होगा तथा एक नई शुरुआत का बिगुल बजाना पड़ेगा.

