Wednesday, 14 December 2016

किसी के नाम एक खुला ख़त (डिजिटल चिट्ठी)..!!

किसी के नाम एक खुला ख़त (डिजिटल चिट्ठी)..!!
प्यारे बाबू जग्गुआ,
मैंने सुना कि तूने अंबेडकर और भगत सिंह को जेल में बंद कर दिया? चल कोई नहीं, इससे ज्यादा तुझ से क्या उम्मीद रखी जा सकती है.. अंग्रेजों ने भगत सिंह को तो फांसी पर लटका ही दिया था. तुझे क्या मची थी जो तूने उन्हें फिर से जिंदा किया और जेल में बंद कर दिया? और अंबेडकर से तेरी क्या दुश्मनी हो सकती है? खैर जो भी हो..

At JNU Ad-block (Freedom square) (pic by Samim Asgor Ali, JNU)


पता है जग्गुआ जब मैं तेरी बड़ी-बड़ी आंखों के अंदर नाचती काली पुतलियों से झांक कर तेरे दिल में देखता हूं तो मुझे एक बच्चा नजर आता है जो काफी डरा और सहमा हुआ है और वही कर रहा है जो उसे सिखाया गया है, वह बच्चा ना एक इंच इधर देखेगा ना एक इंच उधर, कोई शरारत नहीं गजब का आज्ञाकारी, क्रिएटिविटी घोल कर रखी थी गिलास में लेकिन उसने उसे पैर से मार कर गिराने की बात तो दूर छुआ तक नहीं, क्योंकि उसे सिखाया गया था कि अपने मन से कुछ ना करना, इधर उधर जाना, हाथ पैर मारना, कुछ नया सोचना, दिमाग लगाना इत्यादि पाप है और नदी किनारे सांप है..
At JNU, Freedom Square (pic by Samim Asgor Ali, JNU)
और उस बच्चे ने कभी कुछ सोचा ही नहीं, उस बच्चे ने कभी दिमाग लगाया ही नहीं, वह तो उसी एक फार्मूला पर ही चलता रहा जो उसके समाज ने उसे दे दिया था, उसे सिखाया गया था कि सवाल मत करना और उसने सवाल नहीं किया. मुझे नज़र आता है कि यही बच्चा अब बड़ा हो गया है, इसकी बढ़ती हुई उम्र और पकते हुए बालों के साथ-साथ इसके "सवाल ना करने वाले" संस्कार भी परिपक्व होते गए. यह बड़े जगह पर गया, देश-विदेश घुमा, इसने कई तकनीक सीखी यह तकनीकी के क्षेत्र का मास्टर बन गया. यह समझ गया कि तकनीकी विश्वविद्यालय में पढ़ाए जाने वाले फॉर्मूला की तरह ही यह समाज भी बिल्कुल एक सटीक और सीधे फार्मूले पर चलता है, उसने सामाजिक घाल-मेल पर कभी ध्यान ही नहीं दिया, गलती उस बच्चे की नहीं थी, गलती फिर भी समाज की ही थी लेकिन जब वह बड़ा भी हो गया तब भी इस गलती को न समझ सका और जिम्मेदारी समझ कर उसे ढ़ोता रहा. जग्गुआ तू वही अड़ियल बच्चा है. तूने न जिंदगी को समझा ना जिंदगी को जी पाया, काश मैं तेरा बचपन लौटा पाता क्योंकि तेरे बचपन ने तेरी जवानी खराब कर दी और उसने तेरी पूरी जिंदगानी को खराब कर दी. बड़ी दुविधा है.
तेरा अड़ियल मन चाहता है कि सारे बच्चे और जवान तेरी तरह ही हो जाए. ना तू खुश है ना तू दूसरों को खुश देखना चाहता है जग्गुआ, तुझे बस "लगता" है कि तू खुश है लेकिन तू खुश नहीं है. मैं चाहता हूं कि तू जहां है वहां तेरी नींद खुले, क्योंकि जहां तू है वहां सब की नींद खुलती है, जहां तू है वहां शुरू में सब को दर्द होता है जब उनके हर रूढ़िवादी और ब्राह्मणवादी संस्कारों को चैलेंज किया जाता है.
जहां तू है वह एक संस्थान नहीं, ना ही वो कोई स्थान है जहां तू है वह एक आईडिया है, एक सोच है, वह कल के समाज को बनाने की एक दिशा है, तेरे तकनीकी भाषा में मैं बोलूं तो वह एक ब्लूप्रिंट है समाज का, वह तुझसे और आज से 100-200 साल तो आगे ही है. वैसे मन की बात करूं तो तू जहां था पहले वह भी एक आइडिया था लेकिन तेरे जैसे कुछ लोगों ने उसे आईआईटी दिल्ली भर बना कर छोड़ा.. काहे.. मन की बात खाली वही करेंगे का?

Picture from the wall of Pankhuri Zaheer, JNU
वैसे हाँ, ये आइडियाज़ किसी रूप, रंग, समय, जाती, उम्र, जिंदगी और मौत से परे हैं, और जो जिंदगी और मौत से परे है उसी को तेरे पूर्वजों ने शिव कहा था लेकिन तूने क्या किया उसे एक नाम देकर, उसके गले में सांप लटका कर उसे कागज़ और पत्थरों में कैद करके रख दिया. तू भगत सिंह और अंबेडकर के साथ भी यही करना चाहता है, लेकिन तू फिर भूल रहा है जग्गुआ कि भगत सिंह और अंबेडकर एक सोच है, जेएनयू भी एक सोच है इसमें जेल मत बना, और ना ही इसे जेल में कैद करने की कोशिश कर, तू इसमें सफल नहीं हो पाएगा, बात मान लें. अपनी छीछालेदर मत करा, इंदिरा और मोदी तो बचें नहीं तू भी आजमा ले अपना कौशल.
तेरे गमलों और जुमलों से कुछ नहीं होने वाला. तेरे सजाए गए गमलों में पौधे नहीं क्रांति उगेगी. जिन हवाओं में तू आजकल सांस लेता है उन हवाओं में भी क्रांति है. इन हवाओं ने बहुतों की धमनियों से ज़हर निकालने का काम किया है, इन हवाओं ने मेरे भी धमनियों को शुद्ध किया था, जब मैं जेएनयू आया था तो मैं भी तेरी तरह का हीं एक बच्चा था, मेरे समाज ने जो मुझे सिखाया था मैं उसे त्यागने को तैयार नहीं था और देख आज मैं तुझे ज्ञान दे रहा हूं.
Ad block, JNU (picture by Samim Asgor Ali, JNU)

मैं चाहता हूं कि तू अपने कार्यकाल को सिर्फ एक कार्यकाल नहीं बल्कि छात्र-जीवन समझे और जब यहां से निकले तो तू तकनीक-विद् तो है ही, एक अच्छा समाजिक जानवर भी बन कर निकले. जानवर तो तू पहले से है, बस उसके पहले सामाजिक भर लगाना है.. नॉट वेरी डिफिकल्ट फॉर यू..
अभी तो मैं तुझे प्यार से जग्गुआ कह के पूकार रहा हूं लेकिन मैं चाहता हूं कि उस वक्त जब तू पास होकर निकले तो मैं तुझे इज्जत से जगदीश सर या प्रोफेसर जगदीश बोल कर पुकारूँ.
आशा करता हूं कि तू जब तक है जेएनयू तुझे खूब पुचकारेगा और खूब सुधारेगा. मुझे पता है कि इंडिया कितना भी डिजिटल हो जाए, जियो की कृपा से 4जी - 8जी में बदल जाए लेकिन तू यह फेसबुकिया-चिट्ठी कभी नहीं पढ़ेगा, लेकिन हाँ, अगर पढ़ेगा तो मित्र, अपने ईगो पे मत ले लेना, कुछ सोचना, कुछ दिमाग लगाना जो तूने आज तक कभी नहीं किया है, तेरे लिए कठिन होगा पर फिर भी करने की कोशिश करना.
तेरा कभी न हो सकने वाला छात्र,
किसलय कुमार

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